Lockdown boycott

*लॉकडाउन - मुसलमान ताजिर /बिजनेस मैन/रोज़ का काम करके खाने वाले से सोशल बॉयकॉट और लेन देन बंद*

सोशल मीडिया और न्यूज चैनलों पर इस बात का बाजार गरम है के गैर- मुस्लिमों ने मुसलमनों से लेन दें और कारोबार बंद कर दिया है।  ऐसी न्यूज किसी भी नेक दिल इंसान को अच्छी नहीं लगती। 

इन सब बातों में ये बात तो साफ है के ये सब कुछ दिनों की बात है। आहिस्ता आहिस्ता ये सब खत्म होजाएगा। लेकिन ये बात भी ध्यान रखना जरूरी है के ऐसी नौबत आयी क्यूं और आगे ऐसा ना हो इसके लिए क्या करना चाहिए।

नीचे दी हुई बातों पर अगर ध्यान दे कर अमल किया जाए तो आगे जो भी आदमी ( या समाज) आपसे लेन देन बंद करेगा तो वो आपका नहीं , बलके खुद का नुकसान करेगा और ऐसा करने से पहले वो दस बार सोचेगा।  *नीचे दी हुई बातों को ध्यान से पढे।*

- सही प्लैनिंग के साथ काम की शुरुवात करें। अक्सर देखा गया है मुस्लिमों के बिजनेस शुरू होते ही बंद हो जाते हैं।

- वक़्त की पाबंदी, मेहनत को अपना हथियार बनाएं। दुकान आधा दिन खत्म होने पर ना खोलें। सुबह सुबह कारोबार शुरू करने की आदत डालें।

- चाहे आपको कितना भी टेंशन हो या धंधा पानी बिलकुल डाउन हो, कस्टमर से आपको हस्ते हुए खुश मिज़ाज चेहरे से मिलना है। क्यूं के यही आपका फर्स्ट इंप्रेशन ( पहली मुलाकात) है।

- साफ कपडे पहने। और दुकान को भी साफ रखें। पान सुपारी गुटखा थूकने के लिए अलग बकेट रखें।  किसी दीवार या दुकान के सामने ना थूके। और दुकान धो कर गंदा पानी दुकान के सामने सड़कों पर ना फेके। दिन में २-३ मर्तबा झाड़ू लगाए। खाने की चीजों को धूल मिट्टी से बचाए। हो सके तो ✋ हाथ के दस्ताने पहने।

- झुकता तोलें, कम तोलने से बचे। खास तौर से गोश्त की दुकान वाले । इलेक्ट्रॉनिक तराज़ू वाले १०-१५ ग्राम जियादा तोलें।

- कस्टमर को सामान दे कर शुक्रिया अदा करें। थैंक यू जैसे लफ्ज़ इस्तेमाल करें।

- कस्टमर सामान वापस करे तो खुशी से ले लें।

- तकदीर पर ईमान का मतलब सुस्त या बद मिज़ाज बनना नहीं है।

- ऑनलाइन पेमेंट ( गूगल पे, पे-टीम वगैरा) का इस्तेमाल करें। ये यहूदियों की साज़िश नहीं है।

- होम डिलीवरी ( घर पहोंच सेवा) शुरू करें।

- ऊपर दी हुई बातों पर *मस्जिदों* में प्रोग्राम रख कर (लॉकडॉउन खत्म होने के बाद) इन बातों को अच्छे से समझाएं। समाज सेवक, मस्जिद ट्रस्टी और उलेमा हजरात इस पर ध्यान दें। इस्लामी तिजारत सीखना भी इस्लाम का बड़ा हिस्सा है। मस्जिदों को सिर्फ नमाज़ बयान तक रखना ये इस्लाम को सही ना समझने की अलामत है।

 *इन बातों पर अमल करने के बाद अगर आपसे कोई लेन देन बंद करता है तो वो आपका नहीं, खुद का नुकसान करता है।*

 _- लेखक - मुज़म्मिल हुसैन शेख - पूना महाराष्ट्र
- ईमेल - muzammil.84@gmail.com_

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